रम्माण : परंपरा, आस्था और लोकनाट्य का जीवंत संगम

रम्माण : परंपरा, आस्था और लोकनाट्य का जीवंत संगम

दिनांक : 2026-04-27 00:46:00

गोपेश्वर (चमोली)। उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति में कुछ परंपराएं केवल उत्सव नहीं, बल्कि सामूहिक स्मृति और पहचान का हिस्सा भी हैं। चमोली जिले के सलूड-डूंगरा में आयोजित रम्माण ऐसा ही एक अद्वितीय सांस्कृतिक आयोजन है, जो हर वर्ष न केवल स्थानीय लोगों को, बल्कि दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों को भी अपनी ओर आकर्षित करता है। रम्माण इस मायने में भी खास है कि यह केवल एक मेला नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और लोककला का जीवंत मंच है।

रम्माण की सबसे बड़ी विशेषता इसकी प्रस्तुति शैली है। इसमें रामायण की कथा को स्थानीय परंपराओं और मुखौटा नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। यहां न तो आधुनिक मंच सज्जा का सहारा लिया जाता है और न ही कृत्रिम तकनीक का, बल्कि सदियों पुरानी लोक परंपराएं ही इसकी आत्मा हैं। भोजपत्र से निर्मित मुखौटे, पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज और कलाकारों का समर्पण सभी मिलकर एक ऐसा वातावरण रचते हैं, जिसमें दर्शक स्वयं को कथा का हिस्सा महसूस करने लगते हैं।

यह आयोजन केवल सांस्कृतिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि सामुदायिक एकजुटता का भी प्रतीक है। गांव के लोग महीनों पहले से इसकी तैयारियों में जुट जाते हैं। हर परिवार, हर वर्ग और हर आयु वर्ग का इसमें योगदान होता है। यही कारण है कि रम्माण केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि पूरे समाज का उत्सव बन जाता है।

वर्ष 2009 में यूनेस्को ने इसे विश्व सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता मिलना इस बात का प्रमाण है कि यह परंपरा वैश्विक स्तर पर भी अपनी विशिष्ट पहचान रखती है। यह सम्मान केवल सलूड-डूंगरा गांव का नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड की लोकसंस्कृति का गौरव है।

आज जब आधुनिकता और बदलती जीवनशैली के बीच कई पारंपरिक कलाएं विलुप्त होने के कगार पर हैं, ऐसे में रम्माण जैसे आयोजन उम्मीद की किरण बनकर सामने आते हैं। यह हमें हमारी जड़ों से जोड़ते हैं और आने वाली पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराते हैं।

हालांकि, इस विरासत को सहेजने की जिम्मेदारी केवल स्थानीय समुदाय तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। सरकार, प्रशासन और समाज के अन्य वर्गों को भी इसके संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए ठोस कदम उठाने होंगे, ताकि यह अमूल्य धरोहर आने वाले समय में भी इसी तरह जीवंत बनी रहे।

रम्माण केवल एक लोकनाट्य नहीं, बल्कि यह उस संस्कृति का प्रतीक है, जहां आस्था, कला और समाज एक साथ मिलकर जीवन का उत्सव रचते हैं।

 

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