उत्तराखंड का ‘काकोरी कांड’ : कर्णप्रयाग कांड की 84वीं वर्षगांठ पर शहीदों को नमन
दिनांक : 2026-08-22 13:04:00
कर्णप्रयाग। देश की आजादी के आंदोलन के इतिहास में काकोरी कांड का नाम प्रमुखता से लिया जाता है, लेकिन उत्तराखंड के पहाड़ी अंचल में भी वर्ष 1942 में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ ऐसा ही साहसिक अभियान हुआ था। कर्णप्रयाग कांड के नाम से इतिहास में दर्ज यह घटना भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 20 अगस्त 1942 को हुई थी। इस अभियान का नेतृत्व क्रांतिकारी कप्तान राम प्रसाद नौटियाल ने किया था। कर्णप्रयाग कांड की 84वीं वर्षगांठ पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और इस ऐतिहासिक घटना से जुड़े क्रांतिकारियों को श्रद्धापूर्वक याद किया जा रहा है।

डायनामाइट की सात पेटियां लूटीं
भारत छोड़ो आंदोलन और अगस्त क्रांति के दौरान अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलन को निर्णायक रूप देने की योजना बनाई गई थी। इसी क्रम में 20 अगस्त 1942 की रात करीब एक बजे कर्णप्रयाग स्थित लोक निर्माण विभाग के डायनामाइट स्टोर के ताले को सब्बल से तोड़कर डायनामाइट की सात पेटियां निकाल ली गईं।
क्रांतिकारियों की योजना इस डायनामाइट का उपयोग करते हुए लैंसडाउन छावनी पर कब्जा करने की थी। लूटी गई डायनामाइट की पेटियों को आदिबद्री, कोदियाबगड़, थलीसैंण और बैजरो के रास्ते जोगीमढ़ी तक पहुंचाया गया। इसके बाद 27 अगस्त 1942 को लैंसडाउन छावनी पर कब्जा करने की योजना बनाई गई।
टेलीफोन लाइन काटते समय शहीद हुए केशर सिंह पहाड़ी
योजना के तहत क्रांतिकारियों ने लैंसडाउन छावनी की टेलीफोन लाइन काटने का प्रयास किया। इसी दौरान क्रांतिकारी केशर सिंह पहाड़ी पहाड़ी से गिर गए और शहीद हो गए। उनके शहीद होने के बाद योजना विफल हो गई। इसके बाद अंग्रेजी सेना और पुलिस ने क्रांतिकारियों की धरपकड़ शुरू कर दी और आंदोलनकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की गई।
काकोरी कांड से मिलती है समानता
कर्णप्रयाग कांड की तुलना 1925 के काकोरी कांड से की जाती है। दोनों घटनाओं में अंग्रेजी सरकार के संसाधनों को अपने कब्जे में लेकर स्वतंत्रता आंदोलन को गति देने का उद्देश्य था। दोनों घटनाओं की एक और महत्वपूर्ण समानता यह है कि दोनों के नेतृत्वकर्ता राम प्रसाद नाम के क्रांतिकारी थे। काकोरी कांड का नेतृत्व राम प्रसाद बिस्मिल ने किया था, जबकि कर्णप्रयाग कांड का नेतृत्व कप्तान राम प्रसाद नौटियाल ने किया। कप्तान राम प्रसाद नौटियाल स्वतंत्रता आंदोलन के बाद लैंसडाउन से विधायक भी रहे।

स्थानीय लोगों ने भी दिया था सहयोग
कर्णप्रयाग कांड को सफल बनाने में स्थानीय लोगों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। तत्कालीन विधायक गढ़केसरी अनुसूया प्रसाद बहुगुणा, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी योगेश्वर प्रसाद खंडूरी, जीवानंद खंडूरी, थोकदार देवानंद केडियाल, घनश्याम डिमरी, पातीराम शैली, नारायणदत्त बहुगुणा, हरि सिंह, बख्तावर सिंह, बहादुर सिंह वर्त्याल, रामकृष्ण वैष्णव, विजयराम डिमरी, महावीर प्रसाद द्विवेदी और सदानंद वकील समेत कई लोगों ने आंदोलनकारियों को सहयोग दिया। स्वतंत्रता के बाद योगेश्वर प्रसाद खंडूरी और घनश्याम डिमरी विधायक भी रहे।
आत्मकथा से सामने आया कर्णप्रयाग कांड का विस्तृत इतिहास
कर्णप्रयाग कांड के बारे में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जीवानंद खंडूरी और योगेश्वर प्रसाद खंडूरी लंबे समय तक आम लोगों को जानकारी देते रहे। हालांकि इस घटना की विस्तृत और आधिकारिक जानकारी बाद में कप्तान राम प्रसाद नौटियाल की आत्मकथा के माध्यम से सामने आई। उनकी आत्मकथा का संपादन वरिष्ठ पत्रकार योगेश पांथरी ने किया है।

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं उत्तराधिकारी संगठन चमोली के अध्यक्ष गोविंद सिंह तोपाल की पहल पर जिलाधिकारी चमोली के आदेश के बाद कर्णप्रयाग कांड स्थल पर पहली बार स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर सरकारी कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में उपजिलाधिकारी अलकेश नौडियाल ने ध्वजारोहण किया। कप्तान राम प्रसाद नौटियाल समेत अन्य क्रांतिकारियों के चित्रों पर पुष्पांजलि अर्पित की गई और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के आश्रित उत्तराधिकारियों को सम्मानित किया गया। इस दौरान पौधरोपण भी किया गया।
कर्णप्रयाग कांड से पहले ही गढ़वाल-कुमाऊं में तेज हो चुका था आंदोलन
कर्णप्रयाग कांड के दौरान गढ़वाल और अल्मोड़ा की सीमा से लगे देघाट, सल्ट और सालम क्षेत्र में भी भारत छोड़ो आंदोलन ने उग्र रूप ले लिया था। 19 अगस्त 1942 को अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलन के दौरान गोलीबारी में आठ लोग शहीद हो चुके थे। ऐसे समय में गढ़वाल और कुमाऊं दोनों क्षेत्रों में स्वतंत्रता आंदोलन तेजी से फैल रहा था।
सीमांत जनपद चमोली में स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में कर्णप्रयाग कांड को माना जाता है। इससे पहले ककोड़ा खाल में बरदाईश व्यवस्था के विरोध में गढ़केशरी के नेतृत्व में ऐतिहासिक आंदोलन हुआ था। यह क्षेत्र वर्तमान में रुद्रप्रयाग जिले में आता है।
स्मारक और संग्रहालय बनाने की पहल
कर्णप्रयाग कांड की स्मृति को स्थायी बनाने के उद्देश्य से कर्णप्रयाग के युवाओं ने पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष सुभाष गैरोला की अध्यक्षता में कर्णप्रयाग कांड स्मारक एवं संग्रहालय समिति का गठन किया है। समिति की ओर से स्वतंत्रता दिवस पर विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए गए।
समिति ने केंद्र और राज्य सरकार के समक्ष कर्णप्रयाग कांड से जुड़ी तीन प्रमुख मांगें भी रखी हैं। कर्णप्रयाग स्थित लोक निर्माण विभाग के डायनामाइट स्टोर को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया जाए। राष्ट्रीय स्मारक के साथ संग्रहालय की स्थापना की जाए, जिसमें अपर गढ़वाल के स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास संरक्षित किया जाए। कर्णप्रयाग कांड को विद्यालयी पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए, ताकि नई पीढ़ी इस ऐतिहासिक घटना और स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान से परिचित हो सके।

इतिहास के पन्नों में दर्ज है कर्णप्रयाग कांड
कर्णप्रयाग कांड के बाद क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण बदलाव भी हुए। वर्ष 1943 में कर्णप्रयाग में सरकारी एंग्लो-वर्नाक्युलर अंग्रेजी मिडिल स्कूल की स्थापना हुई। इसी वर्ष गौचर मेले की शुरुआत भी हुई। स्थानीय स्तर पर इन घटनाओं को कर्णप्रयाग कांड के बाद बने माहौल और क्षेत्र में बढ़ी राजनीतिक-सामाजिक सक्रियता से जोड़कर देखा जाता है।
कर्णप्रयाग कांड की 84वीं वर्षगांठ पर उन सभी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और क्रांतिकारियों को विनम्र श्रद्धांजलि, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना जीवन और सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
