चीनी के दाम में उबाल: उत्पादन पर मौसम की मार, त्योहारों की बढ़ती मांग और एथेनॉल का दबाव, त्योहार में कड़वी होगी मिठाई 

चीनी के दाम में उबाल: उत्पादन पर मौसम की मार, त्योहारों की बढ़ती मांग और एथेनॉल का दबाव, त्योहार में कड़वी होगी मिठाई 

दिनांक : 2026-08-22 13:09:00

नई दिल्ली। देश में चीनी की कीमतों में तेजी ने एक बार फिर आम उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी है। घरेलू बाजार में उपलब्धता पर बढ़ते दबाव के बीच कमजोर मानसून की आशंका, गन्ने की अगली फसल को लेकर चिंता, त्योहारों में बढ़ने वाली मांग और एथेनॉल उत्पादन की बढ़ती जरूरत ने चीनी बाजार का समीकरण बदल दिया है। हालात को देखते हुए केंद्र सरकार ने घरेलू आपूर्ति बढ़ाने के लिए 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है।

उत्पादन हुआ, फिर भी क्यों बढ़े दाम?

चीनी की कीमतों में तेजी की सबसे बड़ी वजह घरेलू बाजार में उपलब्धता को लेकर बढ़ता दबाव माना जा रहा है। देश में चीनी उत्पादन पिछले कुछ वर्षों में लगातार एक जैसा नहीं रहा है। कभी उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा तो कभी इसमें गिरावट दर्ज की गई।

15 अप्रैल 2026 तक देश में 273.90 लाख मीट्रिक टन चीनी का उत्पादन हुआ था। इस दौरान देशभर में 541 चीनी मिलें संचालित थीं और उन्होंने 2,865.21 लाख मीट्रिक टन गन्ने की पेराई की। गन्ने से चीनी निकलने की औसत दर 9.56 प्रतिशत रही।

उत्पादन के आंकड़े मजबूत दिखाई देने के बावजूद घरेलू बाजार में उपलब्धता को लेकर दबाव बना हुआ है। यही स्थिति कीमतों को ऊपर रखने वाले प्रमुख कारकों में शामिल है।

मौसम ने बढ़ाई चिंता, अल नीनो बना बड़ा जोखिम

चीनी बाजार के लिए अब सबसे बड़ी चिंता मौसम को लेकर है। इस साल भारत में मानसून के 11 साल के सबसे निचले स्तर पर रहने का अनुमान जताया गया है। कमजोर बारिश से गन्ने की बुवाई और फसल पर असर पड़ने की आशंका है। इसके साथ ही अल नीनो का खतरा भी बाजार की चिंता बढ़ा रहा है।

एमईआईआर कमोडिटीज इंडिया के प्रबंध निदेशक राहिल शेख के मुताबिक, भारत में चीनी की आपूर्ति पहले से दबाव में है और अल नीनो अब एक बड़ा जोखिम बनकर उभर रहा है। यदि बारिश अनुमान के मुताबिक कमजोर रहती है तो गन्ने की बुवाई प्रभावित हो सकती है और इसका असर आने वाले वर्षों में चीनी उत्पादन पर पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में भारत अगले कुछ वर्षों तक वैश्विक चीनी निर्यात बाजार में अपनी भूमिका सीमित रखने को मजबूर हो सकता है।

त्योहारों में बढ़ेगी चीनी की खपत

आने वाले त्योहारी सीजन ने भी चीनी बाजार की चिंता बढ़ा दी है। चीनी की मांग पूरे साल बनी रहती है, लेकिन रक्षाबंधन, गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली के दौरान मिठाइयों की बिक्री में तेज उछाल आता है। इसके साथ ही बिस्किट, टॉफी, शीतल पेय और अन्य खाद्य उत्पादों में भी चीनी की खपत होती है।

ऐसे में यदि बाजार पहले से ही आपूर्ति के दबाव में हो और त्योहारों के कारण मांग अचानक बढ़ जाए, तो कीमतों पर और दबाव बन सकता है।

एथेनॉल ने भी बदला चीनी का गणित

चीनी की मौजूदा स्थिति में एथेनॉल एक महत्वपूर्ण कड़ी बन गया है। केंद्र सरकार पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण को लगातार बढ़ावा दे रही है। इसका उद्देश्य पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करना, वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा देना और किसानों की आय बढ़ाना है।

एथेनॉल आपूर्ति वर्ष 2025-26 में देश में एथेनॉल की संचयी आपूर्ति 800 करोड़ लीटर का आंकड़ा पार कर गई। अखिल भारतीय आसवक संघ के आंकड़ों के अनुसार, जुलाई में कुल मासिक एथेनॉल आपूर्ति में करीब 76 प्रतिशत हिस्सा अनाज आधारित कच्चे माल का था।

गन्ने पर आधारित कच्चे माल से जुलाई में करीब 22 करोड़ लीटर एथेनॉल की आपूर्ति हुई, जबकि जून में यह आंकड़ा 28 करोड़ लीटर था। जुलाई में कुल एथेनॉल आपूर्ति में गन्ने पर आधारित कच्चे माल की हिस्सेदारी करीब 24 प्रतिशत रही, जो जून में लगभग 27 प्रतिशत थी।

इससे सरकार के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर एथेनॉल मिश्रण बढ़ाकर ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करनी है, वहीं दूसरी ओर घरेलू खाद्य जरूरतों के लिए पर्याप्त चीनी उपलब्ध रखना भी जरूरी है।

भारत ने चीनी का निर्यात क्यों घटाया?

भारत कभी दुनिया के बड़े चीनी निर्यातकों में शामिल था। 2020-21 में करीब 70 लाख मीट्रिक टन चीनी का निर्यात किया गया था। 2021-22 में निर्यात रिकॉर्ड 110 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच गया।

इसके बाद घरेलू बाजार में पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने और कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए सरकार ने निर्यात पर नियंत्रण बढ़ाया। इसका सीधा असर निर्यात पर पड़ा।

2022-23 में चीनी निर्यात घटकर 63.08 लाख मीट्रिक टन रह गया, जबकि 2023-24 में यह करीब एक लाख मीट्रिक टन तक सीमित हो गया। इसलिए भारत के चीनी निर्यात में आई गिरावट को केवल उत्पादन या मौसम से जोड़ना सही नहीं होगा। सरकार की बदली हुई प्राथमिकताएं भी इसका बड़ा कारण रही हैं।

निर्यात रोककर भी क्यों बढ़े दाम, अब आयात की नौबत क्यों?

यही मौजूदा चीनी बाजार की सबसे बड़ी विडंबना है। सरकार ने घरेलू उपलब्धता बनाए रखने के लिए निर्यात पर नियंत्रण किया, स्टॉक की सीमा जैसे कदम उठाए और एथेनॉल नीति के जरिए गन्ने के इस्तेमाल को भी संतुलित करने की कोशिश की। इसके बावजूद कीमतों पर दबाव कम नहीं हुआ।

अब घरेलू बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति बढ़ाने के लिए सरकार ने 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी को बिना आयात शुल्क के भारत लाने की अनुमति दी है। सामान्य तौर पर चीनी के आयात पर 100 प्रतिशत शुल्क लगता है। लेकिन इस बार निर्धारित मात्रा में कच्ची चीनी 31 अक्तूबर 2026 तक शुल्क-मुक्त आयात की जा सकेगी।

सरकार का मकसद साफ है—बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ाना, मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर कम करना और कीमतों पर दबाव घटाना।

आगे की राह आसान नहीं

चीनी बाजार के लिए आने वाले महीने बेहद अहम रहने वाले हैं। त्योहारों के कारण मांग बढ़ने की संभावना है, जबकि मानसून और गन्ने की अगली फसल को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। दूसरी ओर एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने की सरकारी नीति से गन्ने के इस्तेमाल का संतुलन भी महत्वपूर्ण हो गया है।

विशेषज्ञों की चिंता मुख्य रूप से मौसम और घरेलू आपूर्ति को लेकर है। यदि बारिश कमजोर रहती है तो अगली गन्ने की फसल प्रभावित हो सकती है और इसका असर अगले चीनी सीजन के उत्पादन पर पड़ सकता है।

ऐसे में 10 लाख टन शुल्क-मुक्त आयात से तत्काल आपूर्ति दबाव कम करने की कोशिश जरूर होगी, लेकिन चीनी की कीमतों का भविष्य केवल आयात पर निर्भर नहीं करेगा। मानसून, गन्ने का उत्पादन, त्योहारों की मांग, एथेनॉल नीति और सरकार के निर्यात फैसले—ये सभी मिलकर तय करेंगे कि आने वाले महीनों में चीनी सस्ती होगी या महंगाई की मिठास और कड़वी होगी।

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