भू-कानून की आड़ में जमीन का खेल? 144 नाली खरीद पर उठे बड़े सवाल

भू-कानून की आड़ में जमीन का खेल? 144 नाली खरीद पर उठे बड़े सवाल

दिनांक : 2026-08-11 18:35:00

देहरादून। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में भूमि खरीद-फरोख्त और कृषि भूमि के व्यावसायिक इस्तेमाल को लेकर अधिवक्ता सेवा मंच उत्तराखंड और पहाड़ स्वाभिमान सेना ने गंभीर सवाल उठाए हैं। मंगलवार को पत्रकार वार्ता में संगठनों ने पौड़ी के एराड़ी गांव में करीब 144 नाली भूमि की खरीद, लैंसडौन और यमकेश्वर क्षेत्र में कथित प्लॉटिंग, आश्रम और रिसॉर्ट निर्माण तथा भूजल दोहन के मामलों की उच्चस्तरीय जांच की मांग की।

वक्ताओं ने आरोप लगाया कि एराड़ी गांव में दून हैचरीज प्राइवेट लिमिटेड द्वारा खरीदी गई करीब 144 नाली भूमि को कृषि प्रयोजन के लिए खरीदे जाने का दावा किया गया, जबकि बाद में इसे छोटे-छोटे भूखंडों में बांटकर बाहरी लोगों को बेचे जाने की प्रक्रिया की जा रही है। उन्होंने भूमि खरीद से लेकर वर्तमान उपयोग तक के राजस्व अभिलेख, रजिस्ट्री दस्तावेज, भूमि उपयोग और संबंधित स्वीकृतियों की स्वतंत्र जांच की मांग की।

पत्रकार वार्ता में वक्ताओं ने आरोप लगाया कि प्रदेश में पुरानी कंपनियों के माध्यम से भूमि खरीद से संबंधित प्रावधानों को दरकिनार करने की आशंका है। उन्होंने वर्ष 2003 से पहले अस्तित्व में आई कंपनियों के नाम पर उत्तराखंड में खरीदी गई भूमि का जनपदवार विशेष ऑडिट कराने की मांग की।

वक्ताओं ने संबंधित कंपनी के गठन, पूर्व और वर्तमान निदेशकों, शेयरहोल्डिंग, संपत्तियों तथा उत्तराखंड में कंपनी की वास्तविक गतिविधियों की भी जांच की मांग की। उनका कहना था कि यदि किसी कंपनी ने किसी विशेष प्रयोजन के नाम पर भूमि खरीदी और बाद में उसका इस्तेमाल रियल एस्टेट गतिविधियों के लिए किया गया, तो इसकी वैधानिकता की जांच होनी चाहिए।

संगठनों ने भू-कानून में वर्ष 2017-18 के दौरान किए गए संशोधनों और विशेष रूप से धारा 154 से जुड़े प्रावधानों की समीक्षा की मांग की। वक्ताओं का कहना था कि पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए भूमि खरीद पर अधिक प्रभावी निगरानी जरूरी है।

वक्ताओं ने लैंसडौन और यमकेश्वर क्षेत्र में भूमि खरीद, प्लॉटिंग और भूमि उपयोग परिवर्तन से जुड़े मामलों की जांच के लिए राजस्व, वन, विकास प्राधिकरण और अन्य संबंधित विभागों की संयुक्त टीम गठित करने की मांग की। कैटल गांव में कथित रूप से पेड़ों के कटान के बाद आश्रम निर्माण के आरोप भी उठाए गए। वक्ताओं ने कहा कि यदि निर्माण स्थल तक पहुंचने वाला रास्ता आरक्षित वन क्षेत्र से होकर गुजर रहा है तो वन विभाग की अनुमति, भूमि की स्थिति और मार्ग निर्माण की वैधता की जांच की जानी चाहिए।

आश्रम, होटल, वेलनेस सेंटर, पंचकर्म केंद्र और रिसॉर्टों द्वारा कथित रूप से कराई जा रही बोरिंग को लेकर भी चिंता जताई गई। वक्ताओं ने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में प्राकृतिक जलस्रोत बेहद संवेदनशील हैं। बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों द्वारा भूजल के अनियंत्रित दोहन से स्थानीय जलस्रोत प्रभावित हो सकते हैं। उन्होंने ऐसे प्रतिष्ठानों की बोरिंग, जल उपयोग और अनुमतियों का विभागीय ऑडिट कराने की मांग की।

संगठनों ने कहा कि यदि भूमि खरीद या उसके उपयोग में नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो केवल खरीदार की ही नहीं, बल्कि संबंधित राजस्व अधिकारियों और अनुमति देने वाली विभागीय प्रक्रिया की भी जांच होनी चाहिए।

अधिवक्ता सेवा मंच और पहाड़ स्वाभिमान सेना ने सरकार से एराड़ी की 144 नाली भूमि की खरीद की उच्चस्तरीय जांच, पुरानी कंपनियों की भूमि का जनपदवार ऑडिट, कृषि भूमि के व्यावसायिक उपयोग की जांच, धारा 154 की समीक्षा और लैंसडौन-यमकेश्वर में विशेष जांच अभियान चलाने की मांग की।

वक्ताओं ने कहा कि उत्तराखंड की जल, जंगल और जमीन केवल आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की विरासत है। इसलिए सरकार को भूमि खरीद और उपयोग से जुड़े आरोपों की निष्पक्ष जांच कर तथ्यों को सार्वजनिक करना चाहिए। नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर संबंधित व्यक्ति, कंपनी अथवा अधिकारी के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।

पत्रकार वार्ता में अधिवक्ता संदीप चमोली, पंकज उनियाल, अधिवक्ता नवनीत कुकरेती, अधिवक्ता हरेंद्र बेदी, सामाजिक कार्यकर्ता अनिल डोभाल, अधिवक्ता विनीत मिश्रा, अधिवक्ता कीर्ति वर्धन बिष्ट और अधिवक्ता प्रदीप पासवान मौजूद रहे।

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