वन्यजीवन के बारें में महत्वपूर्ण जानकारी एवं रोचक तथ्य ………
दिनांक : 2026-03-04 00:49:00
देहरादून : वन्यजीवन (Wildlife) प्रकृति का वह अमूल्य हिस्सा है जिसमें जंगलों, पहाड़ों, नदियों और समुद्रों में रहने वाले सभी जीव-जंतु और पक्षी शामिल होते हैं। पृथ्वी पर जैव विविधता को बनाए रखने में वन्यजीवों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यदि वन्यजीव सुरक्षित रहेंगे तो पर्यावरण का संतुलन भी बना रहेगा।
- एक सींग वाला गैंडा भारत में ही पाया जाता है।
- हाथी भूमध्यरेखीय उपोष्णकटिबंधीय वनों में पाए जाते हैं।
- हंगुल (कश्मीर स्टैग) जम्मू-कश्मीर के दाचीगाम राष्ट्रीय उद्यान में पाए जाते हैं!
- ग्रेट इंडियन बस्टर्ड जैसलमेर (राजस्थान) और मालवा में पाया जाता है।
- कच्छ के रण में फ्लेमिंगो घोंसला बनाकर अंडे देता है।
- कच्छ के रण जंगली गधों का एक प्राकृतिक निवास स्थान है।
- शेर और बाघ की दहाड़ आठ किलोमीटर दूर तक सुनी जा सकती है।
- ऑक्टोपस के तीन दिल होते हैं।
- उल्लुओं के पास नेत्रगोलक नहीं होते, उनके पास नेत्र नलिकाएं होती हैं।
- ध्रुवीय भालुओं की त्वचा का रंग काला होता है।
- वन्यजीवों के संरक्षण के लिए, भारत सरकार ने वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 लागू किया है।
- उत्तराखंड में जंगली भेड़, बकरी, मृग, पक्षी और तितलियां सबसे आम वन्यजीव हैं।
- उत्तराखंड में कस्तूरी मृग, हिम तेंदुआ, घुरल, और मोनाल जैसे दुर्लभ और लुप्तप्राय जानवर भी पाए जाते हैं।
- उत्तराखंड में पाए जाने वाले कुछ स्तनधारियों में बाघ, एशियाई हाथी, गुलदार, कस्तूरी मृग, हिम तेंदुआ, गुलदार हैं।
- उत्तराखंड के कुछ संरक्षित क्षेत्र हैं : कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान, फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान, नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान, राजाजी राष्ट्रीय उद्यान, गोविंद राष्ट्रीय उद्यान, और गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान।
- कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान भारत का प्रथम राष्ट्रीय उद्यान है, जिसकी स्थापना 8 अगस्त 1936 को हुई थी।
- हिमालयी राज्य उत्तराखण्ड में मानव-वन्यजीव संघर्ष एक गंभीर समस्या बनती जा रही है।
- वन्यजीवों से मानव जीवन खतरे में पड़ जाने के कारण पहाड़ों से पलायन भी बढ़ता जा रहा है और गांव निरन्तर खाली होते जा रहे हैं। अधिकांश गाँव भुतहा हो चुके हैं।
- जिन गाँवों में थोड़े बहुत लोग टिके हुए भी हैं उनका जीवन गुलदार, भालू, बंदर एवं सुअर जैसे वन्य जीवों ने संकट में डाल दिया है।
- उत्तराखंड अपनी अनूठी जैव-विविधता के लिए प्रसिद्ध है। भारत में पाई जाने वाली 1200 पक्षी प्रजातियों में लगभग 700 यहाँ पाई जातीं हैं।
- उत्तराखंड के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 12 प्रतिशत से अधिक संरक्षित क्षेत्र है जिसमें 6 राष्ट्रीय उद्यान, 7 वन्यजीव अभयारण्य, 4 संरक्षण आरक्ष और 1 बायोस्फीयर रिजर्व, 1 हाथी रिज़र्व और 2 टाइगर रिज़र्व शामिल हैं।
- उत्तराखंड राज्य में 102 स्तनपायी, 623 पक्षी, 19 उभयचर, 70 सरीसृप और 124 मछली की प्रजातियां पाई जाती हैं।
- भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिकों के शोध पत्र के अनुसार पौड़ी जिले में समुद्रतल से 900 मीटर से लेकर 1500 मीटर की ऊंचाई वाला क्षेत्र मानव गुलदार संघर्ष के लिए सबसे अधिक संवेदनशील है।
- पौड़ी जिले में 400 से लेकर 800 मीटर और 1600 से लेकर 2300 मीटर की ऊंचाई तक यह खतरा बहुत मामूली है जबकि 2300 मीटर से ऊपर और 400 मीटर से नीचे कोई मानव-गुलदार संघर्ष नहीं पाया गया है।
- भारतीय वन्यजीव संस्थान के डी.एस. मीना और डीपी बलूनी आदि अध्ययन के अनुसार चार धाम मार्ग के चौड़ीकरीण एवं रेल आदि परियोजनाओं के कारण भी वन्य जीवन प्रभावित हुआ है।
- उत्तराखण्ड के अस्तित्व में आने के बीस सालों में 1396 तेंदुए मारे गए हैं।
- वन्य जीव संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार इनमें 648 गुलदार या तेंदुए प्राकृतिक मौत से, 152 दुर्घटनाओं में, 65 को मानव भक्षी घोषित होने पर मारा गया, 41 शिकारियों द्वारा अवैध शिकार से तथा 212 अज्ञात कारणों से मारे गए।
- डाउन टू अर्थ के अनुसार सन् 2000 उसे लेकर 2015 तक उत्तराखण्ड में 166 तेंदुए और 16 बाघ मानवभक्षी घोषित कर उन्हें मारने के आदेश जारी किये गए।
- गत 3 वर्षो में उत्तराखण्ड में 28 लोग हाथियों की मृत्यु हुई हैं तथा बड़े पैमाने पर हाथियों द्वारा फसलें नष्ट की जाती रही हैं।
- मानव वन्यजीव संघर्ष एक मुख्य सामाजिक विमर्श बन चुका है, जिसका त्वरित निदान आवश्यक है।
- सड़कों के निर्माण और चौड़ीकरण में वनों के विखंडित होने और बड़े स्तर पर पेड़ों के कटान के कारण ये समस्यायें उत्तरोत्तर बढ़ती ही जा रहीं हैं, जिसके लिए हाल ही में दून घाटी में नागरिकों द्वारा मार्च प्रदर्शन किये हैं।
- विश्व वन्यजीव दिवस 2026 का विषय है “औषधीय और सुगंधित पौधे : स्वास्थ्य, विरासत और आजीविका का संरक्षण” यह विषय मानव स्वास्थ्य, पारंपरिक चिकित्सा और स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं में इन पौधों की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डालता है, साथ ही अत्यधिक कटाई और पर्यावास के विनाश के खतरों से निपटने में भी सहायक है।
- स्वास्थ्य और विरासत : उपचार के लिए उपयोग की जाने वाली हजारों पौधों की प्रजातियों और सांस्कृतिक परंपराओं में उनके महत्व को पहचानना।
- आजीविका : औषधीय और सुगंधित पौधों (एमएपी) के सतत व्यापार के आर्थिक महत्व पर प्रकाश डालना।
- संरक्षण संबंधी कार्रवाई : जलवायु परिवर्तन, पर्यावास की हानि और अस्थिर कटाई सहित इन प्रजातियों के लिए मौजूद जोखिमों का समाधान करना।
- साझेदारी : 2026 के अभियान में CITES, UNDP और IFAW जैसे संगठनों के साथ सहयोग शामिल है ।
- 2026 की थीम इस बात पर जोर देती है कि जैव विविधता संरक्षण में उन पौधों की रक्षा करना शामिल है जो मानव कल्याण और पारिस्थितिक तंत्र को बनाए रखते हैं।
- आइये, आजके दिन हम वन्यजीवन संरक्षण में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें और सक्रिय भागीदारी करें।
- शुभ विश्व वन्यजीवन दिवस!!
- लेखक : नरेन्द्र सिंह चौधरी, भारतीय वन सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं. इनके द्वारा वन एवं वन्यजीव के क्षेत्र में सराहनीय कार्य किये हैं.

