लोकभाषाओं को एआई से जोड़ने की पहल, सीएम धामी ने लॉन्च किया वॉइस कलेक्शन पोर्टल
दिनांक : 2026-10-23 00:56:00
- गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी का डिजिटल संग्रह होगा तैयार.
- भविष्य में अपनी भाषा में संवाद कर सकेगी एआई तकनीक.
देहरादून। उत्तराखंड की लोकभाषाओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए आधुनिक तकनीक का सहारा लिया जा रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने गुरुवार को मुख्यमंत्री कैंप कार्यालय में ‘भाषा एआई’ पहल के तहत गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी लोकभाषाओं के वॉइस कलेक्शन पोर्टल का शुभारंभ किया। एआईएसई फाउंडेशन की ओर से विकसित इस पोर्टल के माध्यम से इन भाषाओं के शब्दों, उच्चारण और बोलने की शैली का डिजिटल संग्रह तैयार किया जाएगा। अभियान की शुरुआत मुख्यमंत्री की कुमाऊंनी भाषा में रिकॉर्ड की गई वॉइस क्लिप से हुई।
इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने कहा कि बोली-भाषाएं किसी भी क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान होती हैं। उत्तराखंड की लोकभाषाओं में यहां की परंपराएं, जीवनशैली और सांस्कृतिक विरासत समाहित हैं। इनके संरक्षण के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग समय की जरूरत है। उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के माध्यम से स्थानीय भाषाओं को बढ़ावा देने के साथ उन्हें व्यापक पहचान दिलाने में भी मदद मिलेगी।
मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में एक ही शब्द के उच्चारण और बोलने की शैली में अंतर देखने को मिलता है। ऐसे में लोकभाषाओं के शब्दों के साथ उनके वास्तविक उच्चारण और स्थानीय बोलने के तरीके को दर्ज करना जरूरी है। इससे एआई तकनीक इन भाषाओं को बेहतर ढंग से समझने और इनके माध्यम से संवाद करने में सक्षम हो सकेगी। उन्होंने यह भी कहा कि इस पहल से दूरदराज के गांवों में रहने वाले लोगों तक उनकी अपनी भाषा में सरकारी योजनाओं और सेवाओं की जानकारी पहुंचाने की संभावनाएं बढ़ेंगी।
कार्यक्रम में पद्मश्री लोकगायक प्रीतम भरतवाण ने कहा कि गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी भाषाओं में उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति, लोकगीतों और जागर परंपरा की झलक मिलती है। इन भाषाओं की मौलिकता और सही उच्चारण को संरक्षित रखना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि जागर अकादमी इस दिशा में सहयोग करेगी।
वहीं, एआईएसई फाउंडेशन के संस्थापक सचिदानंद सेमवाल ने बताया कि इस पहल के तहत तीनों लोकभाषाओं के शब्दों और आवाजों का संग्रह किया जा रहा है। इस डिजिटल डेटा के आधार पर भविष्य में एआई आधारित तकनीक को इन भाषाओं में संवाद करने के लिए विकसित करने में मदद मिलेगी। पहल का उद्देश्य उत्तराखंड की लोकभाषाओं को डिजिटल मंच पर सशक्त बनाना और आने वाली पीढ़ियों के लिए उनकी भाषाई विरासत को सुरक्षित रखना है।
