उत्तराखण्ड में संस्कृत आयोग के गठन की तैयारी, राष्ट्रीय स्तर पर हुआ मंथन, संस्कृत को जन-जन तक पहुंचाने और भारतीय ज्ञान परम्परा को सशक्त बनाने की दिशा में बड़ी पहल
दिनांक : 2026-07-17 03:17:00
- उत्तराखण्ड में उच्च स्तरीय संस्कृत आयोग के गठन पर राष्ट्रीय स्तर का मंथन
- संस्कृत को जन-जन तक पहुँचाने और भारतीय ज्ञान परम्परा को सशक्त बनाने की दिशा में उत्तराखण्ड की बड़ी पहल
- संस्कृत के समग्र विकास एवं भारतीय ज्ञान परम्परा के सुदृढ़ीकरण हेतु विशेषज्ञों ने दिए व्यापक सुझाव
देहरादून : उत्तराखण्ड में संस्कृत के संरक्षण, संवर्धन, प्रचार-प्रसार तथा भारतीय ज्ञान परम्परा के समग्र विकास के उद्देश्य से मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर उत्तराखण्ड संस्कृत आयोग के गठन के संबंध में सचिवालय में एक उच्च स्तरीय संवाद एवं परामर्श बैठक आयोजित की गई। बैठक में आयोग की संरचना, उद्देश्य, कार्यक्षेत्र एवं भावी कार्ययोजना पर देश के प्रमुख संस्कृत विद्वानों, शिक्षाविदों, कुलपतियों एवं नीति-विशेषज्ञों द्वारा विस्तृत सुझाव प्रस्तुत किए गए।
बैठक की अध्यक्षता कर रहे संस्कृत शिक्षा सचिव दीपक कुमार ने उत्तराखण्ड में संस्कृत भाषा एवं संस्कृत शिक्षा की वर्तमान स्थिति का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करते हुए उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय, उत्तराखण्ड संस्कृत संस्थान, संस्कृत शिक्षा निदेशालय तथा संस्कृत शिक्षा परिषद् द्वारा संचालित विभिन्न योजनाओं एवं गतिविधियों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार संस्कृत के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए निरंतर प्रतिबद्ध है तथा इस दिशा में अनेक अभिनव पहल की जा रही हैं। उन्होंने बताया कि 7 जनवरी, 2010 को संस्कृत भाषा को उत्तराखण्ड की द्वितीय राजभाषा का संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया, जो राज्य की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विरासत के संरक्षण की दिशा में एक ऐतिहासिक निर्णय रहा है। उन्होंने आगे बताया कि उत्तराखण्ड राज्य के सभी 13 जनपदों में संस्कृत ग्रामों के प्रति लोगों की बढ़ती रुचि, संस्कृत कुटुम्ब सम्मेलन तथा संस्कृत विदुषी सम्मेलन जैसे सफल कार्यक्रम राज्य में संस्कृत संवर्धन की दृष्टि से अपने-आप में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
बैठक में संस्कृत शिक्षा सचिव दीपक कुमार ने बताया कि 1 दिसम्बर, 2025 को उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय संस्कृत सम्मेलन में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने संस्कृत के संरक्षण, संवर्धन एवं प्रभावी क्रियान्वयन के लिए उच्च स्तरीय उत्तराखण्ड संस्कृत आयोग के गठन की आवश्यकता पर बल दिया था। इसी क्रम में आयोग की रूपरेखा तैयार करने हेतु देशभर के संस्कृत विश्वविद्यालयों, शिक्षाविदों, विद्वानों एवं विभिन्न संस्थाओं से सुझाव प्राप्त किए गए हैं।
बैठक में यह सुझाव प्रमुखता से सामने आया कि प्रस्तावित आयोग केवल संस्कृत भाषा के संरक्षण तक सीमित न रहकर भारतीय ज्ञान परम्परा, वैदिक अध्ययन, अनुसंधान, नवाचार, कौशल विकास, उद्यमिता तथा रोजगारोन्मुखी संस्कृत शिक्षा को बढ़ावा देने की दिशा में कार्य करे। बैठक में संस्कृत के व्यापक जनजागरण के लिए राष्ट्रीय स्तर पर ‘संस्कृत विजय यात्रा’ आयोजित करने का सुझाव दिया गया। साथ ही, देशभर के संस्कृत विश्वविद्यालयों के कुलपतियों, संस्कृत अकादमियों के सचिवों एवं प्रमुख विद्वानों के सहयोग से संस्कृत के प्रचार-प्रसार हेतु एक समन्वित राष्ट्रीय कार्ययोजना तैयार करने पर बल दिया गया।
उत्तराखण्ड के सभी विश्वविद्यालयों में संस्कृत एवं हिन्दू अध्ययन विभाग अनिवार्य रूप से स्थापित किए जाने, संस्कृत भाषा में अधिकाधिक राजकीय कार्य किए जाने तथा राज्य के समस्त मंत्रालयों एवं विभागों में संस्कृत अनुवादकों की नियुक्ति किए जाने का भी सुझाव दिया गया, जिससे अधिक से अधिक कार्य संस्कृत भाषा में संपादित किए जा सकें। साथ ही, विशेषज्ञों ने वैदिक ऋषियों एवं महान आचार्यों के नाम पर अध्ययन पीठों की स्थापना, प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में संवादात्मक संस्कृत शिक्षण केन्द्र विकसित करने तथा संस्कृत के साथ पाली एवं प्राकृत भाषाओं के अध्ययन, अध्यापन एवं अनुसंधान को प्रोत्साहन देने की आवश्यकता पर बल दिया।
उत्तराखण्ड शासन द्वारा संस्कृत भाषा में फिल्म, वृत्तचित्र एवं डिजिटल सामग्री के निर्माण को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने तथा वरिष्ठ एवं सेवानिवृत्त संस्कृत आचार्यों के ज्ञान एवं अनुभव का उपयोग ‘संस्कृत चूड़ामणि योजना’ के माध्यम से शास्त्र-अध्ययन, प्रशिक्षण एवं शोध गतिविधियों में करने का भी सुझाव बैठक में सम्मिलित विद्वानों ने दिया।
बैठक में उत्तराखण्ड राज्य की स्थापना के 25 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर पर्वतीय एवं दूरस्थ क्षेत्रों में संचालित संस्कृत विद्यालयों एवं पाठशालाओं के आधारभूत ढाँचे, शैक्षिक संसाधनों एवं शिक्षण व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए विशेष कार्ययोजना तैयार करने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया।
इस उच्च स्तरीय बैठक में केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मुरली मनोहर पाठक, राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के पूर्व कुलपति प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. गिरीश्वर मिश्र, श्रीदेव सुमन उत्तराखण्ड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. एन. के. जोशी, पाणिनीय शोध संस्थान की अध्यक्षा प्रो. पुष्पा दीक्षित, उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति प्रो. सुधा रानी पाण्डेय, उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्य सचिव इन्दु कुमार पाण्डेय, भारत सरकार के पूर्व सचिव श्री राजीव गुप्ता, पूर्व अपर सचिव सी वी गोपीनाथ, संस्कृत से संबंधित सॉफ्टवेयर एवं हार्डवेयर पर कार्य करने वाले बुलूसू, शास्त्री एवं सुब्रत प्रूस्ती, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आचार्य प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल, दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू अध्ययन विभाग के निदेशक प्रो. ओमनाथ बिमली, दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कॉलेज के संस्कृत विभाग के आचार्य डॉ. सुनील जोशी, उत्तराखंड संस्कृत संस्थानम की पूर्व सचिव डॉ. सविता मोहन एवं कृष्ण सेमवाल, संस्थानम के पूर्व उपाध्यक्ष नन्दकिशोर पुरोहित तथा प्रेमचन्द्र शास्त्री, डॉ. धनंजय तथा डॉ. कृष्ण पाण्डेय सहित शासन के वरिष्ठ अधिकारियों एवं देशभर के अनेक प्रतिष्ठित संस्कृत विद्वानों ने सहभागिता करते हुए आयोग के गठन के संबंध में अपने महत्वपूर्ण सुझाव प्रस्तुत किए।
बैठक में निर्णय लिया गया कि आयोग के गठन एवं उसके उद्देश्यों के संबंध में एक प्रतिनिधिमण्डल शीघ्र ही राज्यपाल, मुख्यमंत्री तथा भारत के मुख्य न्यायाधीश से भेंट कर आयोग की रूपरेखा एवं भावी कार्ययोजना पर विस्तृत विचार-विमर्श करेगा।

