उत्तराखंड में ऐपण कला को बढ़ावा देने का शैल रचना आर्टिजन्स सोसायटी ने उठाया जिम्मा, छात्र-छात्राओं के लिए कराया गया वर्कशॉप…..

उत्तराखंड में ऐपण कला को बढ़ावा देने का शैल रचना आर्टिजन्स सोसायटी ने उठाया जिम्मा, छात्र-छात्राओं के लिए कराया गया वर्कशॉप…..

राज्य में ऐपण कला को बढ़ावा देने के लिए अब शैल रचना आर्टिजन्स सोसायटी ने जिम्मा उठाया है. सोसायटी ने नालन्दा कॉलेज ऑफ एजुकेशन की बीएड थर्ड सेमेस्टर की छात्र – छात्राओं के लिए एक वर्क शॉप करवाया गया जिसमे छात्राओं ने ऐपण कला की विशेषता के साथ उसको तैयार करने की विधि को बारीकियों से सिखा.

सोसायटी ने 20 दिसम्बर से शुरू करवाए गये कॉलेज में बी.एङ थर्ड सेमेस्टर के करीब 70 छात्र – छात्राओं के मध्य उत्तराखंड की सांस्कृतिक लोक कला ऐपण के संबंध में एक तीन दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया .इस वर्क शॉप में छात्र – छात्राओं ने इस कला के सांस्कृतिक महत्व और इसके निर्माण की बारीकियों से अवगत कराया गया .

ऐपण कला के साथ स्टूडेंट्स ने इस में ऐपण कला को रोजगार से कैसे जोड़ा जाए साथ ही निर्मित विभिन्न उत्पादों को व्यवसाय के रूप में किस प्रकार विकसित किया जा सकता है , इस पर भी सीख ली .

कार्यशाला का आयोजन शैल रचना आर्टिजन्स सोसायटी की अध्यक्षा कृति रावत तथा सचिव स्वप्निल शाह द्वारा किया गया . वहीं मामले में कृति रावत का कहना है कि में ऐपण कला से आज के नौजवान वाकिफ नहीं हैं. सबसे ज्यादा मुस्किल बच्चों को इस कला के बारे मे बताना है . और इस कला में पारंगत बच्चे इसको रोजगार से भी जोड़ सकते हैं .

आपको बतादें ऐपण कला का अर्थ होता है, लीपना या अंगुलियों से आकृति बनाना । ऐपण एक प्रकार की अल्पना या आलेखन या रंगोली होती है , जिसे उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र के निवासी अपने शुभकार्यो मे इसका चित्रांकन करते हैं . उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में किसी त्यौहार या शुभकार्यो के शुभावसर पर भूमि और दीवार पर, पिसे चावलों के घोल, गेरू हल्दी ,जौ से बनाई गई आकृति , जिसे देख मन मस्तिष्क में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, और सकारात्मक शक्तियों के आवाहन का आभास होता है . वह उत्तराखंड की पारम्परिक और पौराणिक लोक कला ऐपण है।

माना जाता है, कि कुमाऊं की प्रसिद्ध लोककला ऐपण ,पौराणिक काल से अनंत रूप में चली आ रही है. इस कला का तंत्र मंत्र व आद्यात्म से जुड़ाव है उत्तराखंड की अमूल्य लोक कला ऐपण को , घर के मुख्यद्वार, देहली,और मंदिर को सजाने में किया जाता है,इसके अलावा पूजा विधि के अनुसार, देवी देवताओं के आसन, पीठ आदि अंकित किये जाते हैं ।

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