शोमैन सुभाष घई ने साझा किया 55 वर्षों का फिल्मी सफर, बोले- ‘सिनेमा सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि जीवन को समझने का जरिया है’
दिनांक : 2026-01-26 02:14:00
नई दिल्ली : हिंदी सिनेमा के ‘शोमैन’ कहे जाने वाले दिग्गज फिल्मकार सुभाष घई ने दशकों तक अपनी फिल्मों से न केवल दर्शकों का मनोरंजन किया, बल्कि रिश्तों और मानवीय संवेदनाओं को एक नई पहचान दी. हाल ही में एक मीडिया संस्थान को दिए इंटरव्यू में घई ने अपने 55 साल लंबे फिल्मी सफर, बदलते सिनेमा और फिल्म मेकिंग की बारीकियों पर खुलकर बात की. उन्होंने बताया कि कैसे एक अभिनेता के तौर पर करियर शुरू करने वाले युवा ने भारतीय फिल्म उद्योग के सबसे बड़े फिल्म निर्माताओं में से एक बनने तक का सफर तय किया.
पुणे FTII से हुई थी करियर की शुरुआत
सुभाष घई ने अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताया, ‘आज से करीब 55 साल पहले मैंने पुणे स्थित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) में अभिनय का कोर्स किया था. वहां मुझे न केवल भारतीय, बल्कि विश्व सिनेमा की बारीकियों को समझने का मौका मिला. वही सीख आज मेरे पूरे करियर की मजबूत नींव है.’
पहले एक्टिंग, फिर लेखन और फिर निर्देशन
सफलता के शॉर्टकट को नकारते हुए घई ने बताया कि उन्होंने निर्देशन की कुर्सी संभालने से पहले हर विभाग को करीब से समझा. उन्होंने कहा, ‘मैंने सीधे निर्देशन नहीं किया. पहले 3 साल अभिनय किया, फिर 3 साल लेखन को दिए और उसके बाद 3 साल निर्देशन की बारीकियां सीखीं. मेरा मानना है कि किसी भी क्षेत्र में शिखर पर पहुँचने के लिए उसकी बुनियादी समझ होना बहुत जरूरी है. अलग-अलग भूमिकाओं ने मुझे सिनेमा को हर एंगल से देखने का नजरिया दिया.’
युवाओं के लिए बने मार्गदर्शक
फिल्म मेकिंग के साथ-साथ घई ने फिल्म वितरण और सिनेमाघरों के बिजनेस को भी करीब से जाना. अपनी कंपनी को शेयर बाजार तक ले जाने वाले घई ने फिल्म स्कूल की शुरुआत के पीछे का उद्देश्य भी साझा किया. उन्होंने कहा, ‘मुंबई आने वाले कई युवा प्रतिभाशाली होते हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता कि किस स्टूडियो जाना है या किससे मिलना है. हमारा स्कूल ऐसे ही युवाओं को तैयार करता है ताकि वे पूरी ट्रेनिंग के साथ इंडस्ट्री में कदम रख सकें.’
हर 30 साल में बदल जाता है सिनेमा का चेहरा
इंडस्ट्री में आए बदलावों पर बात करते हुए सुभाष घई ने बड़ी बेबाकी से कहा कि सिनेमा समाज का आईना है. उन्होंने कहा, ‘बदलाव एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. हर 30 साल में नए लेखक और निर्देशक अपनी नई सोच के साथ आते हैं. आज की फिल्में 80 या 90 के दशक जैसी नहीं हो सकतीं क्योंकि आज का दर्शक ज्यादा जागरूक है. समय के साथ कहानी कहने का तरीका और तकनीकी भाषा दोनों बदल गई हैं.’
डिजिटल क्रांति और ओटीटी पर राय
आज के डिजिटल दौर को उन्होंने युवा कलाकारों के लिए एक वरदान बताया. घई के अनुसार, ‘आज सिनेमा अकेला नहीं है. ओटीटी (OTT), वेब सीरीज और टेलीविजन जैसे कई मजबूत माध्यम मौजूद हैं. इससे नए टैलेंट को अपनी बात कहने और पहचान बनाने के पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा मौके मिल रहे हैं.’

