2027 की सियासी जंग : भाजपा की 23 तो कांग्रेस की 51 सीटों पर असली परीक्षा
दिनांक : 2026-08-08 02:48:00
गोपेश्वर (चमोली)। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर भाजपा तथा कांग्रेस फुल इलेक्शन मोड में आ गई हैं। इसके चलते भाजपा 23 सीटों पर तैयारियों को केंद्रित करने लगी है तो कांग्रेस के सामने 51 सीटों को मैनेज करने की चुनौती आ खड़ी हो गई है। मौजूदा दौर में यूकेडी की सक्रियता ने भी दोनों दलों के लिए चुनौती खड़ी कर दी है। इस तरह के हालातों के चलते राष्ट्रीय पार्टियों के सम्मुख सत्ता पर काबिज होने के लिए जमींन को मजबूत करना है तो यूकेडी दोनों दलों के विकल्प के रूप में खड़ा होने की जद्दोजहद में जुटी दिखाई दे रही है। अब तो जेन जी ने खास कर राष्ट्रीय दलों के पसीने छुडा दिए हैं।
बताते चलें कि भाजपा उत्तराखंड में 47 सीटों पर काबिज है। कांग्रेस 19 सीटों पर काबिज होने के चलते इस बार सत्ता पर काबिज होने को जद्दोजहद में है। इस तरह कहा जा सकता है कि भाजपा के सामने 23 तो कांग्रेस के सामने 51 सीटों को मैनेज करने की चुनौती बनी हुई है। हालांकि भाजपा के आंतरिक सर्वे में 32 सीटों पर खतरा मंडरा रहा है। इस तरह की रिपोर्ट के सार्वजनिक होने से कांग्रेसियों की बांछे खिलती दिखाई दे रही है। भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि इस तरह के सिटिंग विधायकों पर एंडी इन्कबेंसी के चलते नए उम्मीदावारों को मैदान में उतारा जा सकता है। इससे 32 सीटों को मैनेज करने में मदद मिलेगी। फिलहाल तो भाजपा ने क्रिटिकल माने जाने वाली 23 सीटों पर फोकस कर दिया है। प्रभारियों की नियुक्ति कर भाजपा ने इस बात के संकेत दे दिए हैं कि 23 सीटों को फतह कर पार्टी हिसाब किताब को दुरस्त कर पुनः सत्ता पर काबिज हो सकती है। इसलिए अब पूरा फोकस 23 सीटों पर कर दिया गया है।
कांग्रेस के सामने 51 सीटों को मैनेज करने की चुनौती बनी हुई है। पिछले दस सालों से सत्ता से दूर होती जा रही कांग्रेस इस बार डू एंड डाई के फार्मूले पर निकल पड़ी है। इसके चलते इस बार प्रदेश संगठन का विस्तार कर लिया गया है। वैसे कांग्रेस में संगठन का विस्तार करना टेडी खीर माना जाता रहा है किंतु इस बार कांग्रेस ने इस मामले में साहस दिखाया है। हालांकि कांग्रेस के सामने भी 19 विधानसभा सीटों पर एंटी इन्कबेंसी का खतरा मंडरा रहा है। इसके चलते प्रत्याशियों में बदलाव तो संभव नहीं है किंतु इसकी भरपाई 51 सीटों को मैनेज करने की रणनीति से ही संभव है। वैसे कांग्रेस में सिटिंग विधायकों में बदलाव करना संभव तो नहीं है किंतु अब पार्टी को इन सीटों को रिपीट करने के लिए खासा पसीना बहाना पड़ेगा। आंतरिक गुटबाजी और बर्चस्व की लड़ाई कांग्रेस की अब तक की सबसे बड़ी कमजोरी रही है। इससे भी पार्टी को बाहर निकलना होगा। भाजपा अभी तक इसी कमजोरी से दूर रह कर लगातार दो बार सत्ता पर काबिज रही है। भाजपा से सीख लेकर ही कांग्रेस को सत्ता पर काबिज होने के लिए कसरत करनी होगी।
उत्तराखंड राज्य बनने के बाद 2002 के पहले चुनाव से लेकर अब तक उत्तराखंड क्रांति दल राज्य की सियासत में मजबूत पैठ नहीं बना पाई है। इस बार लग रहा है कि यूकेडी दोनों राष्ट्रीय दलों के इतर अपने को तीसरे विकल्प के रूप में स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रही है। राज्य की कई सीटों पर दावेदारों की आमद से इस बात के संकेत मिल रहे है कि उक्रांद कई सीटों पर शानदार प्रदर्शन के साथ अपनी पैठ मजबूत कर सकती है। संसाधनों की कमी और कार्यकर्ताओं का अभाव यूकेडी की राह में मुश्किलें खड़ी कर सकता है। मौजूदा दौर में दोनों राष्ट्रीय दलों को चुनौती देने के लिए यूकेडी कतिपय सीटों पर खासा पसीना बहा रही है। ऐसे में यूकेडी की नजर जेन जी पर भी टिक गई है। हालांकि अभी तक जेन जी ने यूकेडी के प्रति जुडाव के कोई संकेत तो नहीं दिए हैं किंतु यूकेडी लगातार युवाओं के सवालों को उठा कर उन्हें अपनी ओर मोड़ने की दिशा में कदम बढ़ा रही है। स्थानीय सवालों को लेकर कतिपय विधानसभा क्षेत्रों में संभावित दावेदार कुछ आस तो जगा रहे है किंतु दोनों दलों की मजबूत रणनीति के आगे यूकेडी के रणनीतिकार किस तरह की रणनीति के साथ आगे बढ़ते है इस पर ही यूकेडी का भविष्य निर्भर करेगा।
उत्तराखंड की राजनीति में एक दौर में निर्दलीय प्रत्याशी राष्ट्रीय दलों के लिए चुनौती बन जाते थे। 2017 के बाद निर्दलीय प्रत्याशी भी कुछ अपवादों को छोडकर कोई खास चुनौती नहीं दे पाए हैं। इस तरह के हालातों के चलते अबकी बार कई सीटों पर इन तीनों दलों को छोड़कर निर्दलीय टिकट न मिलने पर अपनी ही छोड़ी पार्टी के प्रत्याशियों के लिए मुसीबत का सबब बन सकते हैं।
उत्तराखंड में युवाओं के रोजगार, पेपर लीक, मंहगाई तथा क्षेत्रीय विकास से संबंधित मुद्दे विधानसभा चुनाव में हावी रहेंगे। इस तरह के मुद्दों को लेकर भरोसे को जगाना राजनीतिक दलों के लिए जरूरी होगा। किसी दल विशेष द्वारा इन सवालों पर भरोसा न दे पाने की स्थिति में मुश्किलें भी खड़ी होंगी। हालांकि अभी चुनाव के लिए काफी वक्त बचा है। इसके बावजूद राजनीतिक दलों ने जिस तरह तैयारियों को तेज कर दिया है उसके चलते राज्य का सियासी पारा भी अभी से गर्म होने लगा है। इसके चलते ऐन चुनाव वक्त एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप की राजनीति भी इस बार देखने को मिलेगी। अब देखना यह है कि सियासत किस तरह का रूख अपनाती है इस पर ही राजनीतिक दलों का सत्ता पर काबिज होने का इरादा साकार हो पाएगा।
